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Breif Introduction

त्रिवेन्द्र सिंह रावत का जन्म 1960 में पौड़ी गढ़वाल जिले के खेरेसैंण गांव में हुआ था। नौ भाई बहनों में सबसे छोटे, त्रिवेंद्र ने अपना ब चपन अपने मूल गांव में ही बिताया। उनके पिता श्री प्रताप सिंह रावत भारतीय सेना के गढ़वाल राइफल्स में सेवारत थे. अपने गांव के स्कूल में औपचारिक स्कूल शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने जहरीखाल के कॉलेज में दाखिला और इतिहास में अपनी डिग्री पूरी की। बाद में, उन्होंने पत्रकारिता में अपनी मास्टर की डिग्री श्रीनगर में बिरला परिसर से हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से संबद्ध की। सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य में गहरी दिलचस्पी ने उन्हें 19 वर्ष की आयु में आरएसएस में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। पहल आरएसएस स्वयंसेवक और बाद में प्रचारक के रूप में, त्रिवेंद्र ने काफी संगठनात्मक कौशल हासिल किए। 25 वर्षीय स्वयंसेवक के रूप में, उन्हें देहरादून की जिम्मेदारी आरएसएस नगर प्रचारक के रूप में दी गई थी। बाद में उन्होंने आरएसएस के मेरठ क्षेत्र में बहुत सी सफलता के साथ कई अन्य जिम्मेदारियां सफलतापूर्वक निभाईं साथ ही मेरठ में, उन्होंने राष्ट्रदेव नामक पत्रिका के एक संपादक के रूप में भी काम किया। रावत की राजनीति में दीक्षा 1993 में शुरू हुई, जब उन्हें भाजपा के सचिव संगठन के रूप में नियुक्त किया गया। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के शासन के दौरान उत्तराखंड के आंदोलन में रावत ने सक्रिय रूप से भाग लिया और कई मौकों पर जेल गए।

2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद, उन्हें भाजपा के राज्य का संगठनात्मक सचिव बनाया गया रावत ने 2002 में चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था, जब उन्होंने 2002 में राज्य की पहली विधानसभा चुनाव में डोइवाला विधानसभा सीट जीती थी। उन्होंने 2007 में फिर से चुनाव जीता और उन्हें कृषि मंत्री बनाया गया। उनकी मूल जड़ें गाँव में होने के बाबत उन्होने कई नयी कृषि पहलों की शुरुआत करने में मदद की, जिसने उन्हें किसानों से भारी प्रशंसा भी मिली हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनावों में वह रायपुर सीट हार गए, बावजूद इसके संगठन के कार्य में उनकी कौशलता और निपुण होने के कारण उन्हें 2013 में पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया इस क्षमता में उनके सफल कार्यकाल को देखते हुए उन्हें 2014 में उत्तर प्रदेश में पार्टी के मामलों के सह-प्रभार का पद दिया गया. इस परीक्षा को उन्होंने बखूबी निभाया और भाजपा को अपने कार्यक्षेत्र में सफलता दिलाने में पार्टी नेतृत्व की कसौटी पर खरे उतरे लेकिन 2014 में उन्हें डोईवाला विधानसभा उप-चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उस हार के बाद फिर उन्होंने झारखंड विधानसभा चुनावों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए पार्टी को फिर सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. रावत को बाद में 2014 में नमामी गंगे समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।

राज्य विधानसभा के लिए 2017 के चुनाव के दौरान, भाजपा ने 70 सदस्यीय सदन में 57 सीटें जीतकर कांग्रेस पर भारी जीत दर्ज की। रावत ने भी डोईवाला सीट पर फिर से शानदार जीत दर्ज़ की. जब राज्य के मुख्यमंत्री चुनने का समय आया तो भाजपा के नेतृत्व ने राज्य के शासन को रावत को सौंपने का फैसला किया- अपने प्रशासनिक और संगठनात्मक कौशल के लिए जाने-माने इस वफादार पार्टी कार्यकर्ता ने 18 मार्च 2017 को राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। रावत को अपने विनम्र स्वभाव और विचारों की स्पष्टता के लिए जाना जाता है। उनकी एक निर्णायक और साफ व्यक्ति की छवि है , जो लोगों और अपने राज्य को आगे बढ़ाने के लिए फैसले लेने से हिचकिचाता नहीं है रावत जी को पहाड़ी भोजन नहुत पसंद है व्यक्तिगत मोर्चे पर उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता रावत सरकारी स्कूल में शिक्षक के तौर पर काम कर रहे हैं। उनकी दोनों बेटियां कॉलेज में पढ़ रही हैं उनकी पसंदीदा पुस्तक श्रीमदभगवदगीता है और रावत जी इसका अनुसरण करते हुए कर्म की शक्ति में विश्वास करते हैं

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